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हर्बल राज्य का सपना कब होगा साकार

छत्तीसगढ़ को विश्व का पहला “हर्बल राज्य” राज्य घोषित किया गया है। यह एक सकारात्मक पहल है। कल्पना की जा रही है कि हर्बल राज्य आर्थिक दृष्टि से संपन्न तो होगा ही होगा, इसका प्रशासनिक ढांचा भी चुस्त दुरुस्त रहेगा। हर्बल राज्य का सपना सपना नहीं होगा। भले ही यहां शिक्षा 43 प्रतिशत है फिर भी जागरूक किसान , जंगल में आबाद वनवासी , हर्बल उद्योग में संलग्न श्रमिक,वन कर्मचारी और अधिकारी अपने कर्तव्यों के प्रति बड़े निष्ठावान रहेंगे। इस तरह कार्यक्षमता में वृद्धि हो जायेगी और हर्बल सामग्री राजस्व प्राप्ति का उत्तम स्रोत सिद्ध होगा।

एक फसली उत्पादन लेकर आज का किसान कभी भी समृद्ध नहीं बन सकता,इसलिए नए राज्य की परिकल्पना है कि गांव गांव में उद्यानिकी विकास एवं हर्बल उत्पादनों को बढ़ावा दिया जाएगा। सर्वत्र नए उत्साह का संचार होगा। परंपरागत कृषि से होने वाले नुकसानों के कारण किसानों का आकर्षण भी हर्बल उत्पादन की ओर बढ़ रहा है। फिर ये हर्बल मानव शरीर के लिए भी लाभदायक है। उद्यानिकी व हर्बल उत्पादनों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

135000 वर्ग किमी में फैले छत्तीसगढ़ में लगभग 20 हजार गांव बसते हैं।

गांवों की अर्थव्यवस्था स्थानीय कृषि पर निर्भर है और कृषि उत्पादन प्राकृतिक वर्षा और उपलब्ध सिंचाई संसाधनों पर निर्भर है। कई वन्यक्षेत्र ऐसे हैं कि फसल होती ही नहीं तब वनवासी वनोपज बेचकर गुजर बसर करते है। परंतु वन विभाग के कर्मचारी आए दिन निरीह आदिवासियों को सताते रहते हैं। ऐसे वातावरण में हर्बल राज्य की परिकल्पना को साकार रूप कैसे किया जा सकता है। उचित होगा कि वनग्रामों में जड़ी बूटी संग्रह,उनकी साफ सफाई और चूर्णीकरण करने वाले लघु उद्योग धंधे लगा दिए जाएं तो वनवासी अन्यत्र नहीं भटकेंगे। उन्हें रोजगार मिलेगा और वे आत्मनिर्भर होकर स्वच्छ जीवन जी सकेंगे।
आवश्यक नहीं कि वन्य गांवों में ही जड़ी बूटियां मिलती हैं। मैदानी क्षेत्र के गांव भी अछूते नहीं हैं परंतु अज्ञानता के कारण औषधियों की पहचान नहीं हो पाती। संसाधनों का अभाव और जागरूकता की कमी आड़े आती है और औषधीय पौधे काटकर फेंक दिए जाते हैं। गांवों में व्यापक जनभागीदारी और समन्वय हो तो पेड़ पौधों का सरंक्षण किया जा सकेगा। गांव गांव में साक्षरता अभियान की तर्ज पर………………….परियोजना लागू करने की जरूरत है जिसमे ग्रामीणों का भरपूर सहयोग हो।ऐसी परियोजना यदि पेट के साथ जुड़ी होगी तो संशय नहीं कि यह सफल न हो।

• अनुकूल भौगोलिक परिस्थिति–

छत्तीसगढ़ का 45 प्रतिशत भू – भाग वनों से आच्छादित है। वनों में भी 40 प्रतिशत आरक्षित और 59 प्रतिशत संरक्षित वन हैं। राज्य में वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के नियमों के तहत तीन राष्ट्रीय उद्यान और 10 अभ्यारण बनाए गए हैं। छत्तीसगढ़ का तीन चौथाई भू– भाग पठारी है। सरंचना में विविधता और नदियों के अवदान के कारण भूमि छोटे–छोटे पठारों,पहाड़ियों,श्रेणियों और
द्रोणियों में विभक्त है।एक ओर
मैकल का भाग,दक्षिण भाग मैदानी और शेष भाग बैलाडीला की पहाड़ियों से ढका है।मुख्य नदी यहां महानदी है।
वन्य क्षेत्र ऊंचे नीचे पठारी भागों में ही बचे हैं। बस्तर और सरगुजा पूर्णतः वनाक्छादित हैं। वन क्षेत्र तो कृषि के लिए सर्वथा अनुपयुक्त हैं। वनों में इमारती और जलाऊ लकड़ियां,तेंदूपत्ता और साल बीजों की भरपूर पैदावार होती है। छत्तीसगढ़ के वनों में सदैव नमी बनी रहती है। इसलिए जड़ी बूटियां यहां काफी मात्रा में स्वमेव उगती हैं। ऐसी वनौषधियों में और भी वृद्धि हो इसलिए आवश्यक है–
•वनभूमि को सुरक्षित व सरंक्षित किया जाए
• आर्द्रता हेतु जल की व्यवस्था हो
• वनों को प्रदूषण मुक्त किया जाए,उद्योग शहरी क्षेत्र में लगाया जाए
• वन परिक्षेत्रों में यातायात एवं परिवहन साधनों में वृद्धि की जाए
• वनौषधियों की पहचान के तरीके 

वनौषधियां दो प्रकार की होती है – स्थावर और जंगम। स्थावार औषधियां के भी 4 प्रकार हैं– वनस्पति,वृक्ष,वीरुध और औषधि। जंगम दृव्यों के भी 4 प्रकार हैं– जरायुज,अंडज, स्वेदज और उदभीजि।

यह बात मालूम होनी चाहिए कि स्थावर औषधियों के छाल,पत्ते,पुष्प,फल, जड़, कंद, निर्यास और स्वरस सभी उपयोगी होते हैं। जंगम दृव्यों के चर्म,नख , रोम और………… उपयोगी होता है।
महर्षि चरक ने कहा है कि स्वास्थ्य रक्षण,औषधि संचय,औषधि निर्माण और शस्त्रकर्म में काल (समय) की बड़ी उपयोगिता रहती है और इसीलिए जड़ी बूटी संग्रहण के समय इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
वायु का संचार, शीत, उष्ण,वर्षा,वायु रहित काल,ग्रीष्म, दिन रात, पाख,धूप,छाया,चांदनी रात,अंधेरी रात,महीना,ऋतु,संवत्सर।
वनवासी वनोपजों और जंगम दृव्यों का काफी उपयोग करते हैं।जंगली जड़ी बूटियों का उन्हें विषद ज्ञान रहता है। बइगा जनजाति भी तंत्र मंत्र व जड़ी उपचार जानते हैं।आदिवासियों के जीवन में प्रतिदिन उल्लिखित जड़ी बूटियों का प्रयोग होता रहता है। वन अदरख,बांस की पिहरी,वन प्याज,दंश लोचन , सरई–पिहरि, कियोकंद,तेलियाकंद,काली हल्दी, वन सिंघाड़ा,,तिरखुर, बिदारी कंद, भाइबेला की जड़, अंडी की जड़, बिटकी की जड़, बेर की जड़, सेम्हर की जड़ आदि

‘गोदना’ गुदवाना आदिवासियों के अपने रीति रिवाजों का एक अंग माना जाता है और उनकी मान्यता भी है कि गोदना गुदवाने से शरीर स्वस्थ रहता है। गोदना में ये निम्न जड़ी का उपयोग करते हैं– मालबन वृक्ष का रस,बीजा वृक्ष का रस और रमतिला का काजल। हड्डी टूट जाए तब भी वे चिकित्सक के पास जाना जरूरी नहीं समझते। उनके पास इसका इलाज होता है। ये टूटी हड्डी पर हरसिंघरी का पेस्ट लगा लेते हैं।हड्डी जुड़ जाती है। राजनांदगांव के समीप कापसी गांव में एक बइगा वंशानुवंश क्रम में हड्डियां जोड़ने की कला में पारंगत हैं।

कथन का तात्पर्य यह है कि गांव का बइगा भले ही पढ़ा लिखा न हो,पर उसे जड़ी बूटी की अच्छी पहचान रहती है।औषधि को वानस्पतिक नाम वह भले न बता पाए पर उसका गुण और प्रयोग जानता है।

वन विभाग के अधिकारी–कर्मचारी गांव–गांव से परिचित रहते हैं। ये बइगा को विश्वास में लेकर भी जड़ी बूटी संग्रह कर सकते हैं। वन कर्मचारियों के अलावा वनस्पति विशेषज्ञ और आयुर्वेदिक चिकित्सकों की सेवाएं भी जड़ी बूटी पहचान के लिए ली जा सकती है।आयुर्वेद और जड़ी बूटी के ज्ञाता आचार्यों की खोज ने 10–10 वनस्पतियों के 50 गण बनाए।सुश्रुत ने 760 वनस्पतियों के 37 गण बनाए।किसी आचार्य ने रस,गुण,वीर्य, विषक और प्रभाव को मूलाधार माना।वाग्भाट ने भी सूत्र स्थान में इनका विषद वर्णन किया।कुल मिलाकर यूं कहा जाए कि जड़ी बूटियों की खोज करके इनकी परिभाषिक शब्दावली बनाई जानी चाहिए और इन बातों पर विचार होना चाहिए–

उत्पत्ति स्थान, रसायनिक संगठन, नैसर्गिक वर्ग, कल्प, प्रयोग मात्रा, परिचय व चिकित्सा परिणाम

•जड़ी बूटियों को प्रोत्साहन आवश्यक–

हर्बल राज्य घोषित होने पर राज्य का दायित्व है कि वह एक और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा दे और दूसरी ओर जड़ी बूटी उत्पादन पर ध्यान देवे। बिना श्रम के उगे बहुत सी वनस्पतियां प्रतिदिन काटकर फेंक दी जाती हैं जिनका सरंक्षण किया जाना चाहिए।पुनर्नवा नामक वनस्पति पूरे छत्तीसगढ़ में सर्वत्र सड़कों के किनारे पाई जाती है।यह महत्वपूर्ण औषधि है इसकी सुरक्षा की जानी चाहिए।
भारत में 7500 पौधों का उपयोग औषधियों के रूप में किया जाता है जिनमे 3900 औषधीय पौधे वनस्पतियों की खाद्य संबंधी जरुरते पूरी करते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ मिलाकर अब तक 500 जड़ी बूटियों की पहचान हो चुकी है।‘हर्बल सरंक्षण परियोजना’ लागू की जाती है तो बहुत संभव है कि 500 और जड़ी बूटियां पहचान में आ जायेंगी।मनुष्य निरोग रहे इसलिए आवश्यक है कि जड़ी बूटी की उपयोगिता समझी जाए।चिकित्सा प्रणालियों का मूल श्रोत वनौषधि संपदा ही है अतैव उनकी उपेक्षा बर्दास्त नही होनी चाहिए। हमारे यहां सहज सुलभ औषधियां सूचीबद्ध हो चुकी हैं।दिव्य औषिधिओं का सूचीकरण नही हुआ है क्योंकि ये सामान्य प्रचलन में नही हैं

•वनौषिधियों की सुरक्षा का दायित्व 

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जब से पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों पर जोर दिया जा रहा है तब से राज्य सरकारें सतर्क हैं और इसे गंभीरता पूर्वक अमल में लाया जा रहा है परंतु खेद इस बात का है कि जड़ी बूटियों के सरंक्षण व संवर्धन पर यहां पर धन का अपव्यय नही के बराबर है।आधुनिक युग में जहां सारा विश्व ‘जड़ी बूटी की सुरक्षा’ में अपना दम खम लगा रही है तब राज्य सरकार को भी काफी राशि ‘वनौषिधि सुरक्षा’ में झोंक देना चाहिए। विदेशों में तो अब कई जड़ी बूटियों के पेटेंट बनकर सामने आ रहे हैं। कुछ और विचारणीय तथ्य नीचे दिए जा रहे हैं जिस पर अमल किया जाना चाहिए–

कुशल नेतृत्व में वनौषिधि संग्रह हो, बिचौलियों के हाथ ना लगे। जड़ी बूटी उद्योग शहरी क्षेत्र में लगाए जाएं।लघु उद्योग जैसे दवा चूर्णीकरण व साफ सफाई वनग्रामों में हो। हर्बल अध्ययन व अनुसंधान शाला की आवश्यकता। 

सूचीकरण, परिचय, महत्व

उत्पादन, व आर्थिक महत्व की सूचनाओं का प्रचार प्रसार।हर्बल प्रशिक्षण के लिए पुस्तकों का प्रकाशन व प्रदर्शनी आयोजित हो। जड़ी बूटी योजनाएं लागू करने सरकार किसी विभाग को “मॉडल एजेंसी” बनाए | वनौषिधि विकास परिषद गठित हो।हर्बल उद्योग में सलंग्न व्यवसाई, आढ़तिए,मंडियों, उद्योगों व शोध संस्थानों का पंजीयन होना चाहिए।हर्बल आवक से उनका निर्यात भी संभव होगा व राज्य सरकार मुनाफा कमाएगी।

वनवासी विकास समिति के माध्यम से कार्य करने वाले उत्साही कार्यकर्ताओं को सरकार अपने साथ जोड़े।समिति के 220 प्रकल्प भी हर्बल उद्योग में सहायता कर सकेंगे।

• बढ़ती लोकप्रियता और तस्करी

भारतीय जड़ी बूटियों की मांग विदेशों में पहले से बढ़ती जा रही है।विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में 33 प्रतिशत और सम्पूर्ण एरिया में 65 प्रतिशत लोग आयुर्वेद पर विश्वास करते हैं।विकसित देशों में जड़ी बूटियों की लोकप्रियता का यह कारण है कि भारत से लगातार इनकी तस्करी की जा रही है। जड़ी बूटी सरंक्षण में यह बहुत बड़ी बाधा है।दैनिक पत्र पत्रिकाओं के अध्ययन से पता चलता है कि शासन पर बैठे अधिकारी,कर्मचारी और जनप्रतिनिधि स्वयं ऐसे अवैध कार्यों में सलंग्न हैं।यही कारण भी है कि कई औषिधियां विलुप्त होने के कगार पर हैं।
तात्पर्य यह है कि विकास के नाम पर विनाश और दोहन किया जा रहा है।विदेशी कंपनियों का धावा भी दोहरी मार का कारण बन रहा है।प्राकृतिक संपदा के साथ साथ भारतीयों के अथाह ज्ञान व प्रयोगों पर एकाधिकार जारी है।

भोले भाले आदिवासी औषिधियों की पहचान बताकर दलालों को सर्वस्व समर्पित कर देते हैं।संग्रहण के नाम पर आदिवासियों का शोषण व दमन भी निरंतर जारी है।

डॉक्टर प्रकाश पतंगीवार
आयुर्वेद चिकित्सक/साहित्यकार
फ्लैट नंबर 3304,शांति रेसीडेंसी
सी ब्लॉक,आम्रपाली
लालपुर,रायपुर (छत्तीसगढ़)
मो.8889599436

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