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हर गोली सीने पर झेलें…

हम क्रान्ति वीर वतन के दीवाने
मौत मिले या मिले ज़िन्दगी
डरना, घबराना क्या जाने?
ग़दर, जंग, विद्रोह से खेलें

हर गोली सीने पर झेलें
सिर्फ लड़ें हम देश की खातिर
दुश्मन को गन्ने-सा पेलें!
क्रान्ति की बारूद जलाकर

बम, पिस्तोल, तलवार उठायें
ज्वालामुखी-सा गरज उठें
देश-भक्ति की अलख जगायें
बढ़ते कदमों को कोई क्या रोके

हम मिट जाने की जिद ठाने!
सुखदेव, भगत और राजगुरु
के बलिदानों को नहीं भूले
रोशन, अश़फाक,
‘बिस्मिल’ की तरह
फाँसी के तख्ते पर झूलें

शहादत, संघर्ष, कुर्बानी की
हथकड़ी पहन हम निकल पड़े
तोपों के गर्जन को रोकें
हम चट्टानों से अड़े खड़े

शहीदों की बलिदानी राहों पर
हम निकल पड़े हैं इतराने!
हम क्रांति वीर वतन के दीवाने!!

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

गिरिराज सुधा

एम॰ कॉम॰, एम॰ फिल॰
कोटा, राजस्थान मे निवास
फोन: 9602054015

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