हे संगीत परी तुम्हें प्रणाम

काव्य होली

(सुश्री आस्था सक्सेना के जन्म दिवस पर)

सागर की लहरों से उत्पन्न संगीत
राग बंधो की
अमृतमयी सुर सीपियां, लहरियां
हिरणों से इठलाते स्वर
निर्बंध, मुक्त
कभी मीरा, कभी कबीर, कभी सूर, तुलसी,
श्याम, राधा को समर्पित भक्ति सुमन, मनौती
कभी ज्वार सी उमड़ती, लौटती अविराम भव्य स्वर मुद्राएं ,
विराट सौंदर्य की उपासना में भावों पर नृत्य करते शब्द
हिय में तृप्ति सी घोलती कोई राग अहीर भैरव कोई कामोद समीर ! …….

और इन सबसे झरते तुम्हारे संगीत प्राण
जैसे उस निशब्द का कोई रहस्य पुराण !
सुर धमनियों को स्पंदित करता
संगीत के भीतर गूंजता
कोई रहस्यमय दिव्य दैविक संगीत रस !
सुर वेद से अंकुराती
नई स्वर ऋचाएं
तालबद्ध अभिव्यक्तियां
नृत्यमय भाव – रागनियां
सुहासनी प्रेम विरहिनियां !
तुम्हारी संगीत कला की
और क्या पहचान होगी ?

सुरों में संजोयी सरिता–
अनेक रागों के मोड़ तय करती
जल–प्रवाह का बांकपन!
सुरों में समाधिस्थ कोकिल,
कोई बौराई अमराई
किसी आनंद भैरवी का
सुर साधती
संगीत की वसंत ऋतु!


सुर क्षितिज को संवारती

बागेश्री,केदार रंजनी और
गुर्जरी सुर वृंदावनी !!

तुम राग बैरागी मल्हार हो
मीरां बाई की
मधुरंजनी हो मौलश्री राधा की
और हो ‘जोगिया’
योगी कृष्ण की !!!

हे रस रंजनी,रागेश्री , राजेश्वरी
हे हंस मंजरी, सिंधु–भैरवी
हिम कल्याणी
तुम्हे प्रणाम !
तुम हो अजन्मी
तुम सदा सुरों का अमृत
बहाती रहो –

समय के अक्षोर क्षितिज तक
भोर,सांझ गौरंजनी
सूरज चांद के उदय – अस्त तक !
दिशाएं गूंजे
तुम्हारी स्वर कीर्ति से
तुम्हारी यश – समृद्धि से
दिग दिगंत तक!

गिरिराज सुधा