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हैहयवंशियो के परम संरक्षक गुरू दत्तात्रेय

(दत्तात्रेय पूर्णिमा ( जन्मोत्सव)   29 दिसम्बर 2020 ,  हैहयाव्द 1773 पर विशेष)

अनाचार व अत्याचार हर युग मे हुआ है और जव- जव अत्याचार की  अति हुई तो तव- तव इस मर्त्यलोक पर भगवान् श्री विष्णु जी ने अवतार लिया,  और अत्याचार को नाश(अंत) कर धर्म की स्थापना कर वे अपने लोक को गमन कर जाते थे! मै वात कर रहा हूँ  अवधूत औघड संत दत्तात्रेय जी की  जिन्होंने सृष्टि -प्राकृतिक – संपदा और जीवो  से ही चौविस गुरूओ को माना !  जवकि  उस काल मे  भी सप्तर्षि और संभवतः सत्ताईस ऋषि होने के प्रमाण हमारे पौराणिक ग्रन्थ वताते है! उस काल मे  भी गुरू परम्परा थी जो मात्र भृगुवंशी व्राह्मणो सहित अन्य व्राह्मण वर्गो  के पास थी!  उस काल मे भी ये तथाकथित गुरू परम्परा वादी ऋषि …  क्षत्रियो – राजाओ का धार्मिक,  आर्थिक,  सामाजिक शोषण करने मे तथा  स्बयं  को स्थापित करने मे रत् रहते थे!

ये लोग पूजा पाठ  अनुष्ठान  आदि  मे  क्षत्रियो- राजाओ से संकल्प मे प्रचुर धन, हाथी,  घोडे , ऊपजाऊ भूमि,  गौधन,  यहां तक कि धर्मधीरू क्षत्रिय राजाओ की स्त्री, वेटीयो को  भी दान मे लेते थे!  इस तथाकथित गुरू परम्परा के विरोध  मे  एक अवतार हुआ… जिसका नाम दत्तात्रेय  था  ! जो अत्रि ऋषि  और माता अनुसुईया से उत्पन्न  थे जिनको व्रह्मा – विष्णु – महेश का संयुक्त  अंश भी माना जाता है ! उस तथाकथित गुरू परम्परा के विरूद्ध गुरू दत्तात्रेय जी ने  इन सत्ताईस ऋषियो मे से  एक भी ऋषि को  अपना गुरू ना मानकर सृष्टि-प्राकृतिक  – संपदा और जीवो के सकारात्मक और प्रेरक तथा लोक कल्याण कारी गुणो को ग्राह्य करने वाले जीव तथा संपदा को ही गुरू वनाकर लोक कल्याण के मार्ग को प्रशस्त किया!

भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु

भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं व उनसे प्राप्त शिक्षा का विवरण निम्नानुसार है भगवान दत्तात्रेय ने सूर्य को इसलिए गुरु माना क्योंकि वह एक होने के उपरान्त अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग दिखाई देता है। ठीक उसी तरह एक आत्मा विभिन्न देहों के रूप में अलग-अलग दिखाई देता है, परंतु आत्मा होता एक ही है, जैसे कि सूर्य एक है।

  1. पृथ्वी को सहनशीलता व परोपकार के कारण!
  2. पिंगला नाम की वैश्या को वैराग्य के कारण!
  3. कबूतर से मोह के वंधन तोडने के कारण!
  4. वायु निरंतर गतिशील रहने के कारण!
  5. मृग को गुरु मानते हुए सीखा कि कभी भी मौज-मस्ती को लापरवाही में नहीं बदलना चाहिए के कारण!
  6. मछली को मछुआरे की जाल में तड़पते देख दत्तात्रेय ने उसे गुरु माना और सीखा कि लोलूपता या लोभ सदैव हानि पहुँचाने के कारण!
  7. समुद्र से विशालता के कारण!
  8. पतंगे को आग के आकर्षण से सदैव मृत्यु ही मिलती है। इसलिए किसी आकर्षित होने के दुष्परिणाम के कारण!
  9. आकाश से निराभिमान के गुण के कारण !
  10. जल को सरलता के कारण!
  11. यम का नाम सुनते ही लोग मृत्यु के भय से काँपने लगते हैं, परंतु यम को अनुपयोगी को हटाने के कारण!
  12. ऊर्ध्वमुखी अग्नि निरंतर प्रकाशमान और संग्रह से दूर रखने वाली है और उसे स्पर्श करने वाले को अपना रूप देने के कारण!
  13. चंद्रमा पर अपना स्बयं का प्रकाश नही फिर भी सूर्य से प्रकाश लेकर पृथ्वी को प्रकाशित करने के कारण!
  14. अजगर के भूख से विचलित ना होने के कारण!
  15. मधु मक्खी के जीवन कार्य में अद्भुत साधना देखी। पुष्पों का मधुर संचय कर दूसरों को मधु देने में लगी रहने वाली मधु मक्खी परमार्थी होने के कारण!
  16. भौंरे में यह गुण है कि वह अलग-अलग फूलों से पराग लेता है। हमें सदैव अच्छी अच्छी बातें सीखने की प्रेरणा के कारण!
  17. हाथी से वासना के दुष्परिणामों से सावधान रहने के कारण!
  18. काक (कौआ) ने सिखाय कि धूर्तता और स्वार्थपरकता की नीति अंतत: हानिकारक ही होती है के कारण!
  19. अबोध बालक को संसार के मोह-माया के जाल से मुक्त अबोध (नवजात) बालक राग, द्वेष, चिंता, काम, क्रोध, लोभ आदि गुणों से रहित निर्दोष होने के कारण!
  20. धान कूटती स्त्री की चूड़ियाँ खनक रही थीं। घर आए अतिथियों को पता न लगे, इसलिए उसने दोनों हाथों में एक-एक चूड़ियाँ ही रहने दीं। दत्तात्रेय ने इस स्त्री से सीखा कि अनेक कामनाओं के रहते चूड़ियों की तरह मन में संघर्ष होते रहते हैं, परंतु यदि एक लक्ष्य निर्धारित कर लिया जाए, तो सभी उद्वेग-आवेगों का शमन हो जाता है।
  21. लुहार से निरुपयोगी और कठोर प्रतीत होने वाला मानव भी यदि स्वयं को तपाने और चोट सहने को सज्जन हो जाए, तो वह एक उपयोगी उपकरण बन सकता है।
  22. सर्प अपनी प्रकृति के अनुसार दूसरों को कष्ट देता है और प्रत्युत्तर में त्रास पाता है। दत्तात्रेय ने सर्प को गुरु मानते हुए सीखा कि उद्दंड, क्रोधी, आक्रामक और आततायी होना किसी के लिए भी हितकर नहीं है।
  23. मकड़ी के जाल बुनने की क्रिया देख कर दत्तात्रेय ने सीखा कि प्रत्येक मनुष्य का जगत वह स्वयं बनाता है और मकड़ी की तरह फँस कर सुख और दु:ख की अनुभूति करता है।
  24. भृंगज कीड़ा एक झींगुर को पकड़ कर लाया और अपनी भुनभुनाहट से प्रभावित कर उसे अपने समान बना लिया। दत्तात्रेय ने भृंगज को गुरु मानते हुए यह सीखा कि एकाग्रता व तन्मयता के माध्यम से मनुष्य शारीरिक व मानसिक कायाकल्प करने में निश्चित रूप से सफल हो सकता है।

इस प्रकार  गुरू दत्तात्रेय जी ने प्राकृतिक संपदा के अनन्त संसाधनो व जीवो  से उन्होने प्रेरणा तथा गुण लेकर चौविस गुरूओ का चयन किया ! परन्तु किसी  भी भृगुवंशी व्राह्मण अथवा ऋषि को गुरू वनाना स्वीकार नही किया! सतयुग मे  एक हैहयवंशी महाराजा हुए जिनका नाम कृतवीर्य  था वे सुदर्शन अवतारी कार्तवीर्य सहस्रार्जुन जी के पिता थे!   महाराजा कृतवीर्य ने सत्यमार्ग पर चल कर सतयुग के नाम को चरितार्थ किया  इसलिए  इस युग का नाम कृतयुग पडा!

हैहयवंश के संरक्षक वने औघड गुरू दत्तात्रेय

महाराजा कृतवीर्य  की एक सहस्र पुत्र च्यबन ऋषि के शाप से दग्ध हो गये तो राज्य मे असामाजिक तत्बो का बोलबाला होने लगा, चोरी, डकैती, लूटमार की घटनायें होने लगी!  यहां तक कि इनके पुरोहित वर्ग भी क्षत्रिय वर्ग से पूजा  यज्ञ आदि मे संकल्प के नाम पर यजमानो से प्रचुर धन,  भूमि गौ आदि हडपने लगे ! उस समय महाराजा कृतवीर्य उस समय अधिक पीडित हो गये जब उनके पौरोहित ऋचीक मुनि इनका सारा खजाना लेकर भृगु क्षेत्र  कच्छ मे भाग गये!

ऐसे मे महाराजा कृतवीर्य  अति पीडित हो तिलमिला गये !  दूसरी ओर संतान ना होने के कारण वे और अधिक पीडित हो गये!  वे सोचते कि विना संतान के वंश कैसे वढेगा,  राज पाठ कौन करेगा?  प्रजा की पीडा कैसे शान्त होगी?  आदि विचारो मे खोये महाराजा कृतवीर्य चिंतित रहने लगे!   उन्होने  सूर्य,  शिब,  शक्ति (काली) , दत्तात्रेय,  सती अनुसुईया,  श्री विष्णु जी आदि की कई सहस्र वर्ष तपस्या की सभी से चोरो,  तस्करो,  लुटेरो आदि से लड़ने वाला उत्तम  अनष्टदृव्या पुत्र की कामना करते! उस काल मे अतिपीडित महाराजा कृतवीर्य जी सहित समस्त हैहयवंश के संरक्षक वने  औघड गुरू दत्तात्रेय!

गुरू दत्तात्रेय जी की कृपा से ही चक्रवर्ती सम्राट बने

दत्तादिदेवो की कृपा से माता पद्मिनी के गर्भ से  कार्तिक शुक्ल सप्तमी  दिन रबिबार को  सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ! जिसका नाम वुद्धि अर्जुन रखा गया!   महाराजा कृतवीर्य के स्वर्ग गमन के  उपरान्त वुद्धि अर्जुन को राजा बनाया जाने लगा तो  उन्होने राज्याभिषेक के लिये मना कर दिया!   वुद्धि अर्जुन ने कहा कि राजा के सभी निर्णय सही  नही हो सकते,  प्रजा के साथ यदि अन्याय होता है  तो  उस पाप का  भागी राजा को बनना पडता है  ! तब गर्गमुनि ने उनको ऋषि दत्तात्रेय जी की उपासना कर दिव्य ज्ञान प्राप्त करने का विचार दिया!  कई सहस्र वर्ष तपस्या करने के उपरान्त गुरू दत्तात्रेय जी ने अनेको वरदान देकर वुद्धि अर्जुन को तृप्त किया  ! उन्होने राज्य करने के गुणों से लेकर चक्रवर्ती सम्राट वनने तथा अनष्टदृव्या से लेकर सहस्रभुजाओ आदि तक अनेक वरदान और शिक्षा से परिपूर्ण कर .. उनका नाम कार्त्तबीर्यअर्जुन रखा  !  सहस्र भुजा होने के कारण  वे सहस्रवाहु  तथा  सहस्रार्जुन  भी कहलाये गये  ! गुरू दत्तात्रेय जी  की कृपा से ही चक्रवर्ती सम्राट वने  और गुरू दत्तात्रेय जी की कृपा से ही हैहयवंश की स्थापना करते तथा पिच्चासी हजार वर्ष तक  धर्मपूर्वक अक्षय (जीवन पर्यन्त) शासन किया !

गुरू दत्तात्रेय जी  के  आशीर्वाद के कारण राबण सहित सम्पूर्ण पृथ्वी के राजाओ को युद्ध मे पराजित कर सप्तद्वीपाधिपति कहलाये! गुरू दत्तात्रेय जी के शूल से ही दैत्याचार्य भृगु के वंशज परशुराम का वध कर सके  ! गुरू दत्तात्रेय जी  के मार्ग का अनुसरण करते हुए हम  अपने जीवन को परम वैभव की ओर ले जाने का संकल्प आज नही  अभी ले!

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

आचार्य श्री विनोद शास्त्री

श्री कार्त्तवीर्य नक्षत्र ज्योतिष संस्थान्, (प्रश्न एंव खगोल शास्त्री)
श्री कार्त्तवीर्य नक्षत्र ज्योतिष संस्थान् हाथरस!
राष्ट्रीय धर्म प्रचारक
श्री अखण्ड हैहयवंशी क्षत्रिय विकास समिति (रजि), भारत!
हाथरस, फोन: 8445603326

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