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हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के स्वर्णिम हस्ताक्षर : श्री रामसहाय हयारण “प्रचंड”

जीवन का " प्रचंड " परिचय

मध्यप्रदेश के सागर जिले के मालथौन नामक एक छोटे से कस्बे के मूल निवासी रहे स्व.श्री नाथूराम जी की 2 पत्नियां थीं । आपकी प्रथम पत्नि स्व.श्रीमती मथुरा बाई से 2 पुत्र स्व.श्री रामलाल जी, स्व.श्री रामसहाय जी एवं स्व.श्रीमती सबरानी से 3 पुत्र क्रमशः स्व.श्री शालिगराम जी, स्व.श्री श्रीराम जी एवं स्व.श्री रामनारायण जी हुए । स्व.श्री नाथूराम जी के कोई पुत्री नहीं थी । व्यवसायिक बाध्यताओं याकि कारणों से आप मालथौन से खुरई आ गये ।

जीवन-वृत्त

श्री रामसहाय जी का जन्म विक्रम संवत् 1974 ज्येष्ठ सुदी छठ (04/06/1919दिन रविवार) को हुआ था । तब शायद ही किसी ने यह सोचा हो, कि यह नन्हा सा बालक एक दिन अपने परिवार और समाज का नाम गौरवान्वित करेगा ।

प्रतिभा कभी किसी परिचय का मोहताज नहीं होती “ आपने अपने व्यक्तित्व एवं कार्यव्यवहार से इसे साबित कर दिखाया । समय के साथ पारिवारिक एवं व्यवसायिक कारणों से आपके अन्य 4 भाई बीना जाकर बस गये । श्री रामसहाय जी ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं साम्प्रदायिक सदभाव की पहचान मानी जाने वाली खुदा-राम-ईसा की नगरी खुरई को अपनी कर्म-स्थली बना लिया । हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज, धर्म और आध्यात्म के साथ साथ साहित्य लेखन एवं काव्य लेखन में भी आपकी अच्छी समझ थी ।

सामाजिक उपक्रम

आपने हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के युवाओं को स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाने के उद्देश्य से श्री मयूरध्वज अखाड़े की स्थापना की । यह अखाड़ा वर्तमान में श्री नारायण अखाड़े के नाम से आज भी संचालित है । स्वजातीय बंधुओं में धर्म के प्रति आस्था बढ़ाने के उद्देश्य से ताम्रकार रामायण मंडल का संचालन भी किया ।

श्री रामसहाय जी अभिनय कला में भी पारंगत थे । आपने नाट्य कला मंचों पर महाराणा प्रताप का जीवंत कर अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवाया । रामायण मंडल से जुड़े रहने के कारण आपने आध्यात्मिक भजनों के साथ-साथ भगवान राम, कृष्ण, दुर्गा एवं शंकर आदि के भजन लिखकर काव्य लेखन की शुरूआत की । जो समय एवं परिस्थितियों के अनुसार धीरे धीरे और भी बेहतर होता गया । आपने सम-सामयिक सामाजिक गीतों की रचना की । 

आपने ” हिंदी साहित्य समिति “ का गठन कर खुरई नगर के स्थानीय रचनाकारों के लिये एक साहित्यिक मंच प्रदान किया । खुरई नगर में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का श्रेय आपको ही जाता है । आपने बर्तन व्यवसाय को ही अपनी जीविका का माध्यम बनाया । भगवती देवी दुर्गा में आपकी बहुत आस्था रही । स्थानीय माँ सिंह वाहिनी बगुलामुखी देवी मंदिर के संचालन में भी आपका बहुत योगदान रहा ।

हैहय-ह्रदय 

हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के प्रति आपका बेहद झुकाव रहा । स्वजातीय बंधु अपने गौरवशाली हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के इतिहास एवं भगवान श्री सहस्राबाहु के जीवन चरित्र से अनभिज्ञ थे । इस बात को लेकर आप हमेशा चिंतित रहा करते थे । आपकी यही चिंता ” हैहय-ह्रदय ” का आधार बनी ।

वर्ष 1977 में प्रकाशित ” हैहय-ह्रदय ” के माध्यम से आपने सहज एवं सरल शब्दों में हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के गौरवशाली इतिहास, भगवान श्री सहस्राबाहु सहित हैहयवंश, वंशावली, गोत्र, ऐतिहासिक स्थलों, सती स्थलों आदि की जानकारी से स्वजातीय बंधुओं को अवगत कराया । ” हैहय-ह्रदय ” को आज भी हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज की उत्कृष्ट धरोहर के रूप में स्थान दिया जाता है । श्री रामसहाय जी धुन के पक्के थे । किसी बात को विचार करते थे तो उसे करके ही छोड़ते थे । आपके इसी समर्पण, लगन, परिश्रम और जूनून के चलते ही आपको ” प्रचंड ” की उपाधि से विभूषित किया गया ।

मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के अंतर्गत आने वाली हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज बाहुल्य औधोगिक पीतल नगरी चीचली को श्री सहस्राबाहु जयंती की शुरूआत का आधार भी माना जाता है । आपकी सेवा भावना, समाज के प्रति समर्पण एवं ” हैहय-हृदय ” के प्रकाशन के लिये ताम्रकार समाज चीचली के द्वारा आपको सम्मानित किये जाने आमंत्रित किया गया । आपको ” ताम्रपत्र “ देकर सम्मानित किया गया ।

श्री सहस्राबाहु जयंती के अवसर पर चीचली में आयोजित कार्यक्रम से आप बेहद प्रभावित हुए । आपने अपने गृह नगर खुरई सहित पुरे सागर जिले एवं मध्यप्रदेश में इस आयोजन की शुरूआत के लिये स्वजातीय बंधुओं को प्रेरित किया । खुरई नगर में होने वाले श्री सहस्रार्जुन जयंती के आयोजन में प्रति वर्ष आस-पास के अलग अलग क्षेत्रों से स्वजातीय बंधुओं को आमंत्रित किया जाने लगा । आज देश के लगभग सभी हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज बाहुल्य कस्बों, शहरों और नगरों में यह आयोजन वृहद् रूप में मनाया जाता है ।

श्री रामसहाय हयारण जी बेहद सहज, सरल व्यक्तित्व के धनी थे । आपका मिलनसार एवं मृदु स्वभाव लोगों को बरबस अपनी ओर खींच लेता था । जरूरतमंद एवं दीनदुखियों की मदद करना आपकी सहृदयता का स्वयं परिचय देता है ।

आपने अपने कार्य व्यवहार एवं लेखनी से समाज और राष्ट्र को जागृत करने का पूरा प्रयास किया । श्री रामसहाय जी के सामाजिक, साहित्यिक एवं आध्यात्मिक परिचय के पश्चात अब बारी है उनके व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन से आपको अवगत कराने की ।

गृहस्थ आश्रम 

श्री रामसहाय जी हयारण ” प्रचण्ड ” जी का शुभ विवाह सागर नगर के प्रतिष्ठित हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के श्री गनपत लाल जी ताम्रकार (मनिहारी वालों) की पुत्री श्रीमती गुलाबरानी के साथ हुआ था । जिनसे आपकी 2 संताने हुईं । आपके एकमात्र पुत्र श्री लक्ष्मण प्रसाद जी हयारण जो कि शासकीय शिक्षक रहे एवं पुत्र वधु श्रीमती राधारानी एक आदर्श गृहिणी के रूप में जानी जाती रहीं । आपकी एकमात्र पुत्री श्रीमती कमला देवी ताम्रकार हैं जिनका शुभ विवाह जबलपुर निवासी श्री रामसेवक जी ताम्रकार के साथ संपन्न हुआ था । जीवन में वह समय भी आया दाम्पत्य जीवन के सफ़र में आपको अकेला छोड़कर आखिरकार एक दिन आपकी जीवन संगिनी श्रीमती गुलाब रानी जी ब्रह्मलीन हो गईं ।

परिवार मे भी है सेवा भावना 

खुरई नगर में आपके पुत्र श्री लक्ष्मण प्रसाद हयारण ने आपके पदचिन्हों पर चलते हुए जीवन की आखिरी साँस तक सामाजिक कार्यों में अविस्मरणीय योगदान देते हुए आपके सेवा कार्यों को आगे बढ़ाया । आखिरकार..जिसने भी जन्म लिया है उसे एक न एक दिन इस नश्वर देह का परित्याग भी करना है । आपके सुपुत्र श्री लक्ष्मण प्रसाद जी हयारण एवं उनकी धर्मपत्नि भी असमय ब्रह्म लीन हो चुके हैं ।

श्री रामसहाय हयारण ” प्रचंड ” जी के परिवार से उनके सुपुत्र श्री लक्ष्मण प्रसाद जी हयारण के ज्येष्ठ पुत्र श्री प्रदीप ताम्रकार जी वर्तमान में हैहयवंशीय क्षत्रिय ताम्रकार कसेरा संगठन मध्यप्रदेश के जिला अध्यक्ष एवं रिश्तों की..” शुभ पहल ” सेवा परिवार के संयोजक के रूप में निरंतर समाज सेवा के पथ पर अग्रसर हैं । हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज को अतीत के इस हैहयवंशीय स्वर्णिम हस्ताक्षर के व्यक्तित्व से परिचित कराते हुए मैं स्वयं को गौरवान्वित मेहसूश कर रहा हूँ । वर्तमान में प्रचण्ड जी लिखित ” हैहय-हृदय “ की आवश्यकता को देखते हुए उसके पुनः प्रकाशन के प्रयास जारी हैं ।

मोक्ष प्राप्ति

श्री रामसहाय हयारण ” प्रचण्ड ” ने वर्षों से सुप्त एवं निर्जीव पड़े हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज में जो चेतना जागृत कर जन-जागरण की जो अलौकिक ज्योति प्रज्ज्वलित की थी, वह आज भी कहीं न कहीं हमारे आपके हृदय में जागृत है । शनै शनै ही सही परिवर्तन की लहर दिखाई दे रही है । आपके ऊपर प्रभु श्री राम की सहाय सदैव ही रही । 04/06/1919 को इस नश्वर धरा-धाम पर अवतरित हुई यह हैहयवंशीय क्षत्रिय दिव्य ज्योति 15/09/1990 को महज 71 वर्ष की उम्र में ब्रह्म में लीन हो गई । 

हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज की एकमात्र आधुनिक डिजिटल पत्रिका “विमर्श ” परिवार आपको शत शत नमन करता है । आपका देवलोक गमन हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज के लिये अपूरणीय क्षति है ।

सहृदय सादर : शब्दांजलि
हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार

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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार 

सेवक, चिंतक एवं विचारक
हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज
खुरई (जिला-सागर) मध्यप्रदेश
संपर्क : 8319385628

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