डिजिटल विमर्श

लेखक - गिरिराज सुधा

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हर गोली सीने पर झेलें…

हम क्रान्ति वीर वतन के दीवानेमौत मिले या मिले ज़िन्दगीडरना, घबराना क्या जाने?ग़दर, जंग, विद्रोह से खेलेंहर गोली सीने पर झेलेंसिर्फ लड़ें हम देश की खातिरदुश्मन को गन्ने-सा पेलें!क्रान्ति की बारूद जलाकरबम, पिस्तोल, तलवार...

सावन के स्वागत में

सावन के स्वागत में, बाँसुरी की तानें,कोयल भी कूक उठी, राग पूर्वा गाने।बूँदों की खुमारी से, अम्बुआ भी बहका,सृष्टि के यौवन से, मन उपवन दहका।घटा, मोर, पपीहे लगे गीत सुनाने,मनुहारें इन्द्रधनुषी, मधुरम मुस्कानें।तोड़ तट...

प्राणों को अर्पित करें – भारत माँ के नाम

स्वतन्त्रता संग्राम था, प्राणों का बलिदान,आज़ादी अब हो गई, सियासी घमासान।मुल्क, मशालें, अलविदा, प्राणों की थी सेज,सरफरोशी हसरतें, आज़ादी लबरेज़।बम, धमाके, इन्क़लाब, क्रान्ति, जाँ-निसार,आज़ादी देकर गये, कुर्बानी के यार।ज़ेल...

श्वासों की जुगलबंदी

जब योग सितार बजता है, तन में सुर-ताल सजता है। फ़िक्र करो उसकी यारों, जो दिल के साथ धड़कता है। संभावना है शिखरों की, जब योग का जादू चलता है। श्वासों की है जुगलबंदी, मौन का संगीत झरता है। गीता गा और दृष्टा बन, क्यों घर...

विपस्सना

साक्षित्व भाव का योग है विपस्सनाआतिजाति श्वास को बस देखना ।इस पर देह उस पर है चैतन्यश्वास के हर छंद पर नज़र रखना।स्वयं में फिर हो जाएं मौन सागरभाव तरंगों का छोड़ यह झुनझुना।में देह नही, मैन नही, न श्वास हूँमें हूँ...

प्रकृति के साथ एकाकार

तबला वादक एवं प्रकृति उपासक श्री देवेंद्र सक्सेना, कोटा के जन्मदिवस पर एक भेंटगिरिराज सुधा, कोटामाँ की कोख सेप्रकृति की गोद मेंपल्लवित, पोषित होतुम हुए दिव्यता के साथ एकाकारसांसारिक रिश्तों के पारतुम्हारे अवतरण कीहरित...

सुन विद्यार्थी

योग व ध्यान जिंदा रख,सम्यक पहचान जिंदा रख।आत्मस्थ हो साधक बन,वैदिक शान जिंदा रख।जीवन मुक्ति दीप जला,सत्व अनुष्ठान जिंदा रख।ज्ञानपंथ का तू खड़ग ,आत्मोउत्थान जिंदा रख।गर्व, दृढ़ता, संयम, व्रत,पवित्र साधन जिंदा रख।शिष्य से...

हे संगीत परी तुम्हें प्रणाम

(सुश्री आस्था सक्सेना के जन्म दिवस पर)सागर की लहरों से उत्पन्न संगीत राग बंधो कीअमृतमयी सुर सीपियां, लहरियांहिरणों से इठलाते स्वर निर्बंध, मुक्त कभी मीरा, कभी कबीर, कभी सूर, तुलसी, श्याम, राधा को समर्पित भक्ति सुमन...

होली उत्सव प्रीत का

गिरिराज सुधा, कोटापीतल की पिचकारी में घुले हैं रंग हजार,दुश्मन दोस्त हो गए, है होली का त्यौहार।रंगों में सब धुल गई, आपसी तकरार,सबके दिलों में रहे, प्यार की दरकार।होली उत्सव प्रीत का, खेलें मिलकर फाग,फागुन मन में बो गया...

फाग फुहारें होली की

गिरिराज सुधा, कोटाहैहयवंशी रंग में, भीगे जूही पलाश,होली की बौछारें पहुँचीं, रंगों के आकाश।दिलों में ले पिचकारियाँ, संकल्पों के रंग,सपनों की अठखेलियाँ, चाहतों के चंग।फागुन का नर्तन हुआ, वसंत के दस्तूर,होली हैहयवंश की...

टेसुई यादें

फिर वसंत ने भेज दिया एंक खत मौलश्री के नाम ! सिलसिला फिर शुरु होगा मनुहार का नेह-निष्ठ भावों के बढ़ते ज्वार का राग-अनुराग आस्था की हरियाली में हैं फूटते रिश्ते प्रेम के बनते अचानक टूटते पागल हवाएँ भेजतीं मेघों को कोई...

रंग वसंत के

(एक) कचनारी देह में पलाश रख गयी बयार वसंत आते आते! अंतस् के आँगन में अमलतास बौराए चाह के हिरन मचले पलकों से बतियाये रतनारे नयनों में तलाश कर गयी बयार वसंत आते आते! उत्पाती भ्रमरों के सम्मोहन छोर-छोर वनवासी कलियों में...

आध्यात्म: अंतस् का फाग

जिंदगी कैसी भागमभाग, संचय, नर्तन और संताप। ढलता सूरज, सागर तट पर, सजी पालकी चला उजास। बेशकीमती साँसों का घर, आत्म-वैभव से आबाद। सात्विकता की दौलत जोड़ो, योग जगाये अन्र्तआग। मौन की भाषा योग सिखाता, स्वानुभूत वासंती राग।...

नववर्ष: मैं सनातन समय हूँ

मैं समय योग हूँ, काल पुत्र हूँ, तिथियों के बंधन से मुक्त हूँ। दिन, वर्ष, महीनों में बँटा नहीं, मैं नदियों की धार विरक्त हूँ। मैं सहस्त्रार से सुषुम्णा तक दिव्य, आलोक से ऊर्जस्वित संकल्प हूँ। मैं अन्तरंग-बहिरंग के मध्य...

मकर संक्रांति: खेल

खेल में छुपे हैं कितने रंग, गंध और किलकारियाँ! तितलियों के पीछे भागना सुबह से शाम, जुगनुओं की रोशनी को मुट्ठी में कैद कर बतियाना तालाब की मँुढेर पर! खेल है हृदय का स्पंदन बच्चों की निश्छल हँसी जीवन का ज़्ाज्बाती संगीत...

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