मौनी रेखाएं

काव्य होली

जहान की जरूरत
जरूरत है इस जहान को ऐसे इंसानों की
कि मिश्री घुली जुबां बोलना आदत हो जिनकी

जरूरत है इस जहान को ऐसे इंसानों की
कि आसपास खुशी से खिले चेहरे देखना जरूरत हो जिनकी

जरूरत है इस जहान को ऐसे इंसानों की
कि ख्वाहिश हो जिनकी कामयाबी दूसरों की ख्वाहिश की

जरूरत है इस जहान को ऐसे इंसानों की
कि इस मतलबी भीड़ में भी दूसरों की चोट पर आंखे नम हो जिनकी

जरूरत है इस जहान को ऐसे इंसानों की
कि इन भ्रष्ट अक्लमंदों में ईमानदार बेवकूफ कहलाना चाहत हो जिनकी

जरूरत है इस जहान को ऐसे इंसानों की
कि जिनका शरीर ही नहीं आत्मा भी हो इंसानों की

जरूरत है इस जहान को सिर्फ इंसानियत की

मौनी रेखाएं

एक दिन पूछ रही थी मै अपने हाथों की रेखाओं से क्या सोच रखा है,
क्या लिख रहा है मेरे भविष्य के लिए
क्या कुछ कर पाऊंगी मै इस समाज के लिए,
अपने देश के लिए,
अपने सिसकते देश के लिए,
अपने जरूरतमंद लोगों के लिए,

क्या कुछ भी,
सागर में बूंद सा भी कुछ कर पाऊंगी
या फिर रह जाऊंगी,
इन्हीं की तरह जरूरतमंद बन कर

घंटों पूछती रही मै अपने हाथ की रेखाओं से
कुछ भी नहीं बोली ये रेखाएं
बस बैठी रही और भविष्य की ओर देखती रही
एक मौनी साधु की तरह

प्रदीप वर्मा (हैहयवंशीय)