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समाज, संगठन और सहयोग 

समाज, संगठन और सहयोग  (सम सामयिक) 

हमारा हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज मूलत: मजदूरी और व्यवसाय से जुड़ा हुआ समाज है । समय के साथ तेजी से बदलते परिदृश्य के बावजूद आज भी लगभग 30% से अधिक स्वजातीय परिवार  मजदूरी करके जैसे तैसे अपना गुज़र बसर कर रहे हैं । मार्च 2020 से कोरोना महामारी के चलते व्याप्त लॉक डाऊन से इन स्वाजातीय परिवारों के समक्ष रोजी रोटी का भीषण संकट बना हुआ है । मजदूरों के साथ साथ व्यापार से जुड़े स्वजातीय परिवार भी जिवन यापन की विभिशिका से जुझ रहे हैं । 

एसे विपरीत समय में समाज और संगठनों का यह नैतिक दायित्व बनता है कि  किसी तरह से आर्थिक दृष्टि से कमजोर और जरूरतमंद इन स्वाजातीय परिवारों की मदद की जाये ।  परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम  नहीं अधमाई हज़ारों वर्ष पूर्व लिखी रामचरित मानस की उक्त चौपाई का गूढ़  अर्थ तो यही है कि  वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम सभी मिलकर समाज के एसे कमजोर परिवारों के समक्ष सेवा और सहयोग का जज्बा दिखाएं । 

 

अपितु वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत दिखाई दे रही है । 

महामारी के इस भीषण दौर में भी  दूर दूर तक सामाजिक स्तर पर कोई व्यवस्था दिखाई नहीं देती । शासन और प्रशासन द्वारा बहुत कुछ किया जा रहा है । समाज सेवी संस्थाएं भी अपने अपने स्तर पर बहुत कुछ कर रहे हैं । फिर भी इतना कुछ काफी नहीं है । 84 लाख जीव योनियों में सर्वोत्तम कृति के रूप में ईश्वर ने हमें मनुष्य के रूप में जन्म दिया है । लेकिन अफसोस कि  कुछ एक अपवादों को छोड़कर स्वयं को मनुष्य के रूप में जन्म लेकर स्वयं पर गर्व करने वाला इन्सान इंसानियत से कोसों दूर है । आज जब भाई भाई को सुखी देखकर ईर्ष्या से भर जाता हो एसे में अपने ही किसी स्वाजातीय बंधु की तकलीफ़ को कोई क्यूं समझेगा । 

बेशक हमारा हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज विविध स्वरूपों में कितना ही कमजोर और पिछड़ा हुआ क्यूं न हो लेकिन स्वाभिमान तो निश्चित रूप से है । समय और परिस्थितियां भले ही विपरीत रहें लेकिन किसी से मदद की गुहार तो बिल्कुल नहीं लगायेगा । इस स्थिति में हम  सभी की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि  हम अपने आस पडौस, गाँव, कस्बों और शहर के अपने जरूरतमंद स्वाजातीय परिवारों की परिस्थितियों का स्वत: आकलन कर व्यक्तिगत, सामाजिक और सांगठनिक रूप से मदद के लिये आगे बढ़ें । 

आज आवश्यकता है मानवीय संवेदना दिखाने की, स्वयं को मनुष्य साबित करने की । 

अगर ईश्वर ने आपको इस आबिल बनाया है कि  आप इसी की मदद कर सकते हैं तो अवश्य करें । यह मानकर कि ईश्वर ने आपको यह जिम्मेदारी सौंपी है । समय सदैव एक जैसा नहीं रहता । मनुष्य योनि में जन्मे हम सब खाली हाथ आये हैं और जायेंगे भी खाली हाथ । अगर कुछ साथ जायेगा तो बस हमारे आपके द्वारा किया गया सदकर्म । अच्छे अथवा बुरे तरीके से हमने जो कुछ भी जोड़ा और कमाया है सब यहीं रखा रह जायेगा । यह सर्वथा और कटु सत्य है । 

आज हमारे हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज में नगर, जिला और प्रदेश सहित राष्ट्रीय स्तर के अनेको संगठन हैं । लेकिन क्या हम कभी अपनी सांगठनिक क्षमता को साबित कर सके? नहीं हमारा पूरा समय एक दूसरे को नीचा दिखाने में ही जाता है । अपने समय, श्रम, धन, ऊर्जा और क्षमता का उपयोगअब तक हम  नकारात्मक ही तो करते आये हैं । 

सोचिये, मनन कीजिये और स्वयं आकलन कीजिये, आपको क्या मिला, आपके समाज और संगठन का क्या और कितना भला हो गया ? 

अगर समाज की भलाई के लिये कोई कुछ कर रहा है अथवा करना चाहता है तो हमारा पूरा प्रयास उसे रोकने पर लगा रहता है । जो लोग समाज के हित लाभ को ध्यान में रखकर कोई भूमिका बनाते हैं, समूचे समाज को उन भले लोगों का तन मन  धन से यथा संभव सहयोग करना चाहिये । लेकिन इसके विपरीत साम दाम  दंड भेद से हम अपना पूरा जोर लगा देते हैं कि  कोई कुछ न करे । वर्षों से जो जैसा चल रहा है उसी को नियति  मानकार चलाने की हमारी  पुरजोर कोशिश अनवरत जारी है ।  हमारी स्वयं वादी सोच सिवाये अपने किसी दूसरे का भला चाहती ही नहीं ।

 

सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वे संतु निरामया जैसी संस्कृति को मानने वाले महान भारत देश के लोगों को क्या हो गया है ? 

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो । प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो निश्चित रूप से आप भी यह प्रार्थना करते ही होंगे । फिर ईश्वर के समक्ष प्रार्थना में रहने वाले आपके सदभाव यथार्थ में कहाँ विलुप्त हो जाते हैं ? धर्म का उद्घोष करते वक्त विश्व के कल्याण की वह मंगल कामना आपके व्यक्तित्व में क्यूं नहीं झलकती । 

जिस रोज आपअपने ही स्वजातीय भाई बंधुओं के कल्याण की भावना रखकर कार्य व्यवहार करने लगेंगे, आपको समूचे विश्व का कल्याण स्वमेव दिखाई देने लगेगा । 

कोरोना महामारी की भीषण त्रासदी से आजसमूचा विश्व पीडित है । मानवीय सभ्यता नित निरंतर, असमय काल के गाल में समा रहे हैं । हर घर में, हर गली मे, हर नगर में सन्नाटा पसरा हुआ है है । हमारा हैहयवंशिय क्षत्रिय समाज भी इस त्रासदी से अछूता  नहीं है । न जाने कितने स्वाजातीय परिवारों ने असमय अपनों को खोया है । उन सभी दिवंगत स्वाजातीय जनों के समक्ष सादर श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए, विनम्र भाव से ईश्वर से यही प्रार्थना है उनके परिजनों को इस असीम दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें । इस सम सामयिक विषय पर अपने विचारों को सार्वजनिक करते हुए कोरोना महामारी की भीषण त्रासदी से आजसमूचा विश्व पीडित है । 

 

मानवीय सभ्यता नित निरंतर, असमय काल के गाल में समा रही हैं 

हर घर में, हर गली मे, हर नगर में सन्नाटा पसरा हुआ है है । हमारा हैहयवंशिय क्षत्रिय समाज भी इस त्रासदी से अछूता  नहीं है । न जाने कितने स्वाजातीय परिवारों ने असमय अपनों को खोया है । उन सभी दिवंगत स्वाजातीय जनों के समक्ष सादर श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए, विनम्र भाव से ईश्वर से यही प्रार्थना है उनके परिजनों को इस असीम दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें । इस सम सामयिक विषय पर अपने विचारों को सार्वजनिक करते हुए, मेरे मन में किसी व्यक्ति विशेष अथवा संगठन के प्रति को दुराभाव नहीं । 

मेरा प्रयास यही है कि हमारे आपके हृदय में मानवीय संवेदना के सुप्त पड़े भाव जागृत हों । जिन जरुरतमंद स्वाजातीय परिवारों को सामाजिक स्तर पर जिस तरह के भी सहयोग की आवश्यकता है, वह उन्हें मिले । जो भी स्वजातीय बंधु व्यक्तिगत रूप से, स्वयं को अपेक्षा के अनुरूप स्वयं को, जिस तरह से सहयोग कर पाने की सामर्थ्य रखते हैं जरूर करें । स्वजातीय संगठनों  के द्वारा स्वजातीय परिवारों को सांगठनिक रूप से सार्वजनिक सहयोग अवश्य किया जाये । 

आज वक़्त है स्वयं को साबित करने का, मनुष्य होने के नाते हम और आप इतना तो कर ही सकते हैं । 

अंत में बस इतनी सी प्रार्थना और करना चाहूंगा । व्यक्तिगत अथवा सामाजिक रूप से किया जा रहा  यह पुण्य कार्य बिना किसी प्रचार अथवा फोटोग्राफी और नामोंके किया जाये । किसी भी स्वाजातीय परिवार के स्वाभिमान पर ठेस पहुंचाये बिना निस्वार्थ भाव से किया गया सहयोग सदैव याद रखा जायेगा । 



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इस लेख के रचनाकार से मिलिये

हैहयवंशी चंद्रकांत ताम्रकार 

सेवक, चिंतक एवं विचारक
हैहयवंशीय क्षत्रिय समाज
खुरई (जिला-सागर) मध्यप्रदेश
संपर्क : 8319385628

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