सहानुभूति एवं दानशीलता

दयाशीलता विशेषांक सामाजिक चिंतन

सहानुभूति

सामाजिक जीवन में सहानुभूति, सौहार्द का मानवीय संवेदनाओं में एक विशेष सहयोगत्मक स्थान होता है| सामाजिक जीवन में हम सहानुभूति, सौहार्द, पुर्ण व्यवहार से समाज के अन्य मित्रों, सहयोगियों, रिश्तेदारों, के दुख दर्द, कष्ट में सहानुभूति के शब्दों माध्यम से उनके दुख दर्द में सहभागिता दर्शाते हुए, अपनी भावनाऐ, संवेदनाएं, व्यक्त करते है| वास्तव में सहयोगत्मक, सहानुभूति परस्पर मानवीय भावनाओं, संवेदनाओं का श्रैष्ठ, प्रेमपुर्ण मधुर, लोक व्यवहार होता है| 

हम अपने सहयोगी, मित्रों, रिश्तेदारों, के दुख दर्द, किसी संकट, मुसीबत के समय, सहयोगत्मक सहानुभूति के माध्यम से संबंधित व्यक्ति का मनोबल, उत्साह बढ़ाते हुए, भबिष्य की संभावनाओं के लिए, संबल प्रदान करते हैं| सहानुभूति के दो मधुर वचनों से, प्रेमपुर्ण व्यवहार के साथ, सहयोगत्मक, सम्मान जनक व्यवहार से व्यक्ति जीवन में उत्साह वर्धन, उमंग का संचार होता है| सहानुभूति एक ऐसा मानवीय गुण होता है, जिसके अंतर्गत हृदय गत, भावनाओं के माध्यम से संभावनाओं, अनुकूल परिस्थितियों के उज्ज्वल पक्ष को व्यक्त करते हुए, जीवन को भबिष्य के लिए, आशांबित कराता है| 

समाज में उस व्यक्ति की लोकप्रियता भी अधिक देखने को मिलती है, जो किसी विपरीत परिस्थितियों में सहानुभूति के द्वारा मानवीय संवेदनाओं, सहानुभूति पुर्ण, व्यवहार कर, अन्य व्यक्ति के मनोबल को दृढ़ता प्रदान करता है| मनोविद् भी इस बात से सहमत हैं कि विपरीत दुखद परिस्थितियों में सहानुभूति के द्वारा मानवीय संवेदनाओं का व्यक्त किया जाना, कुशल सकारात्मक, सेवा भाव, एक उत्तरदायित्व पुर्ण, संवेदनशील, सामाजिक जिम्मेदारी पुर्ण, लोक व्यवहार होता है| 

मानव के सामाजिक जीवन में सोम्यता, सुझबुझ, वुद्धिमानी, सहयोगत्मक, सृजनात्मक व दुरदर्शिता पुर्ण व्यवहार, जीवन में नयें उत्साह पुर्ण भावनाओं का संचार होता है| निश्चित ही दुसरो के दुख दर्द कष्ट कठीनाईयो में संवेदनशील, सहानुभूति से किसी व्यक्ति को सुख की अनुभूति प्रदान कराना, महान शेक्षणिक गुण होता है| जो मानवीय पीड़ा में व्यवहार कुशलता का सर्वश्रेष्ठ भावनात्मक योगदान होता है| सहानुभूति के सहयोगत्मक व्यवहार से मानव के चेतन अवचेतन मन में, वुद्धि में, विचारों में परिवर्तन करते हुए, जीवन में पुर्ननिर्माण, पुर्नाउत्थान के लिए सकारात्मक भावनाओं का प्रदुर्भाव उत्पन्न होता है| 

सहानुभूति से मानव मन में नकारात्मक विचारों से बाहर आकर, सकारात्मक मानसिक सौच विकसित होकर, उन्नति प्रगती, विकास पथ पर अग्रसर होता है| सहानुभूति मानव के हृदय पटल पर, कठिनाई में, विपरीत परिस्थितियों में, गहरा प्रभाव छोड़ती है| जिससे व्यक्ति दुख दर्द कष्ट से बाहर निकलने, सामर्थ्य प्राप्त कर, जीवन जीने के लिए, नई ऊर्जा शक्ति प्राप्त होती है|

 

दानशीलता

 

आचार्य चाणक्य ने कहा है:
दारिद्र्य नाशनं दान शींल दुर्गतिनाशम् |
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी ||

अर्थात, दान देने से दरिद्रता नष्ट होतीं हैं, अच्छे आचरण से कष्ट दूर होते हैं, मनुष्य की दुर्गति समाप्त होती है| वुद्धि से अज्ञान नष्ट होता है, ईश्वर भक्ति से भय दूर होतीं हैं | इस प्रकार आचार्य चाणक्य ने कहा है कि दान देने से दरिद्रता नष्ट होतीं हैं| एवं अनेक भारतीय मनिश्रियो संतों ने भी कहा है कि “दान दिये, धन न धटे” बताया है| वास्तव में सनातन हिन्दू धर्म, भारतीय जन मानस में दानशीलता का सरोकार अन्न, धन, पदार्थ, सम्पत्तियों के समान वितरण से अभिप्रेरित होकर, दान को धर्म कर्म से जोड़कर, दानशीलता को एक पुनित कर्म, श्रेष्ठ कर्म, निरुपित किया गया है| 

प्राचीन समय में दान का वास्तविक उद्देश्य अन्न का सभी प्राणियो में उनकी आवश्यकता के लिए समान वितरण से रहा है| इसके लिए गृहस्थ का परम् कर्तव्य दानशीलता माना गया है| भागवत् पुराण में कहा गया है कि देहधारियो का केवल उतनें ही पदार्थ पर अधिकार है, जितने से उसकी उदर पुर्ति होती है|अन्न धन, पदार्थ, सम्पति के संग्रह से व्यक्ति में अहंकार उत्पन्न होकर, समाज के अन्य वंचित वर्गों का शोषण होता है|

दानशीलता का अभिप्राय हमेशा देश काल परिस्थितियों से बदलता रहा है| दुर्भिक्ष अकाल, आदि प्राकृतिक विपदाओं के समय अन्न दान मानव मात्र के लिए कल्याण कारक माना गया है| एवं सामान्य परिस्थितियों में पदार्थ, धन अन्न, सम्पत्तियों के दान से गरीब, वंचित वर्ग, समाज सेवा को श्रैष्ठ दानशीलता माना गया है| धार्मिक कृत्यों में देवालय, सेवालय, जलकुप, प्रबंधन, बृक्षो के संरक्षण को दानशीलता का श्रैष्ठ कर्म अवसर प्रतिपादित किया गया है| युध्द के समय धन गहने, सम्पत्तियों आदि के साथ शरीर तक राष्ट्र को समर्पित, दान कर देना दानशीलता की परिकाष्ठा माना गया है| 

सामान्य व्यवहारिक सामाजिक जीवन में दानशीलता को सर्वश्रेष्ठ धर्म कर्म माना गया है| दानशीलता को धर्म के साथ संग्लंग कर इसे मोक्ष धर्म का मार्ग बताया गया है| प्राचीन समय से ही दान करने की प्रवृति को प्रोत्साहित किया जाकर, दानशीलता को मानव मात्र के कल्याण के लिए सर्वश्रेष्ठ कर्म माना गया है| मानव एक सामाजिक प्राणि है, अता समाज कल्याण, लोक व्यवहार, लोक कल्याण, समाज सेवा के लिए सक्षम वर्ग को दान देना, सफलता, लोकप्रियता, का व आनन्दित होने, आत्म गौरान्वित होने का अवसर माना गया है |